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सच दिखाने का जज्बा

*वर्दी उतरी, कफन ओढ़ा: जिन हाथों ने सहारा दिया, उन्हीं बेटों ने पिता की सांसें छीन लीं.?*

#आज गांव की गलियों में सन्नाटा है, घर में मातम और हर आंख में एक सवाल—क्या जमीन के टुकड़े के लिए अब पिता भी पराया हो गया...?

Neta ji
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सूरज, मीरगंज(पूर्णिया):-जीवनभर वर्दी पहनकर अनुशासन, कर्तव्य और ईमानदारी की मिसाल बने एक पिता ने शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस घर में वे सुरक्षित बुढ़ापा बिताने लौटे हैं, वही घर उनकी अंतिम सांसों का गवाह बनेगा। बीएमपी से सेवानिवृत्त मंगल हसदा ने एक महीने पहले ही सेवा से विदा ली थी—यह सोचकर कि अब शेष जीवन बच्चों और परिवार के साथ सुकून से बीतेगा। लेकिन लालच ने रिश्तों को इस कदर अंधा कर दिया कि उसी सुकून को मौत में बदल दिया गया।

गांव वालों के अनुसार, सेवानिवृत्ति के बाद मिली राशि और पैतृक जमीन परिवार में जहर बनकर घुलने लगी थी। पिता बार-बार समझाते रहे—“जमीन बंट सकती है, खून का रिश्ता नहीं।” मगर बेटों के कानों तक पिता की बात नहीं, सिर्फ पैसों की खनक पहुंच रही थी।

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विवाद के उस आखिरी दिन भी मंगल हसदा ने झगड़ा शांत कराने की कोशिश की। उन्होंने दोनों बेटों को समझाने के लिए आवाज उठाई, लेकिन आवाज दबा दी गई—लाठियों और मुक्कों से। जिन हाथों को उन्होंने चलना सिखाया था, उन्हीं हाथों ने उन्हें जमीन पर गिरा दिया। और जब गांव के लोग पहुंचे, तब तक पिता की धड़कनें थम चुकी थीं।

यह सिर्फ एक बुजुर्ग की हत्या नहीं है, यह उस समाज पर करारा तमाचा है जहां संपत्ति के आगे संस्कार, रिश्ते और इंसानियत हार जाते हैं। जिसने पूरी उम्र बच्चों के भविष्य के लिए वर्दी पहनी, वही पिता अपनों की हवस का शिकार बन गया।

आज गांव की गलियों में सन्नाटा है, घर में मातम और हर आंख में एक सवाल—क्या जमीन के टुकड़े के लिए अब पिता भी पराया हो गया…?

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