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एक ऐसा मेला जहां अविवाहित युवा-युवतियां चुनते हैं अपना पसंद के जीवन साथी.

मेला का मुख्य आकर्षण टावर पर चढ़ कर की जाने वाली है पूजा

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एक ऐसा मेला जहां अविवाहित युवा-युवतियां चुनते हैं अपना पसंद के जीवन साथी.
 
पुरे बिहार में यह आदिवासी समाज का है एकलोता मेला.

मेला का मुख्य आकर्षण टावर पर चढ़ कर की जाने वाली है पूजा.

✍️एस.के. सम्राट
✍️एस.के. सम्राट

पुर्णिया(बिहार):-पूर्णियां जिला के बनमनखी अनुमंडल अंतर्गत मलिनियां गांव में लगने वाले प्रसिद्ध पत्ता मेला में जीवन साथी चयन व पसंद करने की अलग छूट रहती है. बिहार का यह इकलौता मेला है जहां हर जवां दिल आने से पहले और घर लौटने तक धड़कता रहता है. यह धड़कन तब तक रहती है, जब तक कि उनकी शादी नहीं हो जाती है. बैसाखी सिरवा त्योहार से यह मेला शुरू है और गुरुवार से ही कई दिलों की धड़कनें भी तेज हो गयी हैं. दरअसल यह मेला आदिवासी समाज का है. इसका इतिहास 100 साल से भी ज्यादा  पुराना है. पुराने जमाने में जब किसी को अपना जीवन साथी चुनने का खुला अधिकार नहीं था, तब का आदिवासी समाज इतना मुखर जरूर था कि उनके युवा को अपना जीवन साथी खोजने की खुली छूट की प्रथा थी. वही परंपरा इस मेले में आज भी बरकरार है. अब तो इसी समाज से प्रेरित होकर अन्य वर्गों में भी इसका असर दिखने लगा है. हर साल बैसाखी सिरवा-विषवा के अवसर पर आदिवासी समाज के लोग यहां भव्य मेला का आयोजन करते हैं.यह दो दिनों तक चलता है. मेला का मुख्य आकर्षण केंद्र लकड़ी के टावर पर चढ़ कर की जाने वाली खतरनाक पूजा  है.बताया गया कि मेला के दौरान खुलेआम देशी चुलाई दारू सेवन कर नाच -गान की भी प्रथा थी. जिसपर वर्ष-2016 से हीं शराबबंदी के समर्थन में नाच-गान पर आदिवासी समाज ने पाबंदी लगा दी. लेकिन तब से नशा मुक्त आदिवासी समाज के बुलंद नारे के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रथा शुरू की गई है. जिसमे देश के कई राज्यों के नामचीन आदिवासी कलाकार भाग लेते रहे हैं. मेला आयोजन समिति ने बताया कि इस बार फिर बिहार, झारखंड, बंगाल, उरिसा एवं नेपाल से आदिवाशी समुदाय के नामचीन कलाकार पत्ता मेला में अपने परम्परिक कला का जलवा विखेरेगे.
 
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बिहार के इस चर्चित पत्ता मेला में देश के विभिन्न भागों यथा झारखंड, नेपाल, बंगाल, ओड़िशा के अलावे बिहार के विभिन्न जिलों के आदिवासी युवक-युवतियां बेहद सजधज कर अपने भावी जीवनसाथी ढूंढने आते है. ईनमे आपसी रजामंदी जाहिर करने का तरीका भी निराला होता है. सबसे पहले लड़के को जो लड़की पसंद आ जाती है, उसे वे प्रपोज करने के लिए पान खाने का न्योता दिया जाता है यदि लड़की पान खा लेती है तो लड़का उसे आपसी रजामंदी से अपने घर लेकर चले जाते हैं. कुछ दिनों तक साथ रहने के बाद दोनों को विवाह बंधन में बांध दिया जाता है. मेला में पसंद के बाद विवाह से इनकार करने वालों को आदिवासी समाज बड़ा जुर्माना और कड़ा दंड भी देता है. 

क्या है पत्ता मेले का इतिहास :- 
 

पत्ता मेला आयोजन समिति के अद्याक्ष सह भूतपूर्व मुखिया बटन लाल टुडडू, निवर्तमान मुखिया मंगल हंसदा, पीताम्बर टुड्डू, शिक्षक प्रधान हासदा, छोटेलाल हासदा, पूर्व समिति सदस्य गंगाराम बेसरा, राजेश बेसरा, दिनेश रमानी,मोहर लाल रमानी,दयाल रमानी,लक्षण टुड्डू मंटू रमानी,जीतन रमानी आदि लोगों ने बताया कि उनके पूर्वजों को भगवान महादेव व माता पार्वती ने स्वप्न में कहा कि यहां पर हमारी पूजा करें. उसी समय से बिहार के मलिनियां में महादेव-पार्वती की पूजा के साथ पत्ता मेला लगने लगा. स्थानीय लोगों का कहना है कि कलश स्थापना के बाद देशी दारू व पचेय चढ़ाने और उसे भगवन का प्रसाद समझ कर पिने की भी प्रथा थी.जिसे वर्ष-2016 से हीं मुख्यमंत्री नितीश कुमार के शराबबंदी कानून के समर्थन में बंद कर दिया गया.कहा जाता है की यदि कोइ व्यक्ति  चोरी छिपे देशी शराब पीकर मेला पहुच जाय तो उसपर मेला कमिटी की खाश नजर होती है. शराब के नशे में पकरे जाने पर शारबी को दण्डित भी किया जाता है.

पत्ता मेला का मुख्य आकर्षण :-

मलिनियां के पत्ता मेला का मुख्य आकर्षण केंद्र पुजारियों की ओर से टावर पर की जाने वाली खतरनाक पूजा है. पुजारी विधि-विधान के साथ टावर पर चढ़  कर खतरनाक ढंग से पूजा करते हैं. मेला में बांसुरी और ढोल -मंदल की थाप पर आदिवासी समाज के महिला व पुरुष सामूहिक रूप से घंटों थिरकते व कुर्राटे भरते हैं .आदिवासियों के पसंदीदा खेल फुटबॉल का भी यहां प्रदर्शन होता है. खेल में कई राज्य के खिलाड़ी भाग लेते हैं. मेला के ठीक आठ दिन पूर्व फुटबॉल का आयोजन शुरू हो जाता है और समापन पर फाइनल मैच खेला जाता है. इधर दो दिवसीय पत्ता मेला को लेकर आदिवाशी समाज मे उत्साह चरम पर है.

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