Sampurn Bharat
सच दिखाने का जज्बा

*फांसी की सजा तक झेलने वाले बनमनखी के वीर सपूत स्व.कलानंद ठाकुर को आज तक नहीं मिला उचित सम्मान.*

*आजादी का गुमनाम सिपाही: स्व. कलानंद ठाकुर.*

Neta ji
- Advertisement -

- Advertisement -

News Add crime sks msp

*फांसी की सजा तक झेलने वाले बनमनखी के वीर सपूत स्व.कलानंद ठाकुर को आज तक नहीं मिला उचित सम्मान.*

✍️सुनील कु. सम्राट✍️

*आजादी का गुमनाम सिपाही: स्व. कलानंद ठाकुर.*

सम्पूर्ण भारत,बनमनखी (पूर्णिया)—बिहार के उत्तर में स्थित पूर्णियां! पूर्णियां जिला में विशेषकर बनमनखी अनुमंडल, आज़ादी के इतिहास का एक अनमोल अध्याय समेटे हुए है। यह वही धरती है, जहाँ कभी भक्त प्रह्लाद और भगवान नरसिंह के पौराणिक किस्से गूंजे, जहाँ महर्षि मेहि परमहंस जी महाराज की आध्यात्मिक आभा बिखरी, और जहाँ स्वतंत्रता संग्राम में अनगिनत वीरों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।इन्हीं अमर बलिदानियों में एक नाम है—स्वतंत्रता सेनानी स्व. कलानंद ठाकुर।

ग्राम गणेशपुर (थाना के. नगर, पूर्णिया) में जन्मे स्व. ठाकुर का बचपन ननिहाल परोरा (थाना सदर) में बीता। यहीं शिक्षा-दीक्षा के बाद उन्होंने पटना से होम्योपैथ की पढ़ाई पूरी की और बनमनखी में चिकित्सक के रूप में सेवा शुरू की। लेकिन उनका असली मकसद केवल मरीजों का इलाज नहीं था—वे राष्ट्र की बेड़ियाँ तोड़ने के लिए कांग्रेस की पंक्तियों में शामिल हो गए।

 

स्वतंत्रता सेनानी स्व. कलानंद ठाकुर की संघर्ष गाथा:-

कांग्रेस थाना कमिटी के महामंत्री के रूप में वे आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में थे। अंग्रेज सरकार ने उनके जज्बे को तोड़ने के लिए कई बार उन्हें गिरफ्तार किया और कठोर सजाएँ दीं।

📌 26 जनवरी 1933 — टिकापट्टी आश्रम में झंडा फहराने के “अपराध” में 7½ माह की जेल और 50 रुपये जुर्माना।

📌 13 अगस्त 1942 — बनमनखी में गिरफ्तार।

News add 2 riya
News Add crime sks msp
Advo
- Advertisement -

- Advertisement -

📌 11 नवम्बर 1942 — फांसी की सजा सुनाई गई।

📌 30 जनवरी 1943 — पटना हाईकोर्ट से बरी, लेकिन जेल गेट पर ही पुनः गिरफ्तार।

📌 22 जून 1944 — 15 वर्ष का कारावास।

📌 14 फरवरी 1945 — अपील पर पूर्णियां से हजारीबाग सेंट्रल जेल स्थानांतरित। लंबी कैद के बाद रीहाई।

उनकी जेल यात्रा महज सजा नहीं, बल्कि आजादी की कीमत चुकाने का प्रतीक थी।

आज़ादी के बाद भी सेवा:-

स्वतंत्रता मिलने के बाद भी स्व. ठाकुर समाजसेवा में सक्रिय रहे। 1980 में बनमनखी स्थित अपने घर पर उन्होंने अंतिम सांस ली। दुखद यह है कि इतने महान बलिदानी के नाम पर आज न कोई स्मारक है, न सड़क, न विद्यालय—मानो समय की धूल ने उनकी कहानी को ढक दिया हो।

 

गुमनाम दीवानों को पहचान कब.?

आज जब देश 75 से अधिक वर्षों की आज़ादी मना चुका है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या स्व. कलानंद ठाकुर जैसे गुमनाम दीवानों को उनका हक और सम्मान मिलेगा? इतिहासकारों और स्थानीय लोगों का मानना है कि ऐसे वीरों के योगदान को स्कूल की किताबों में शामिल किया जाए और उनके नाम पर स्मारक या संस्थान स्थापित हों, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें कि आज़ादी यूं ही नहीं मिली।

- Advertisement -

- Advertisement -

News Add 3 sks
- Advertisement -

- Advertisement -

SBN self add new reporter
Sampurn Bharat Banner
- Advertisement -

- Advertisement -

Sampurn Bharat Banner