Sampurn Bharat
सच दिखाने का जज्बा

फर्जी इलाज का कारोबार: बनमनखी में ‘सेवा’ के नाम पर सेहत से खिलवाड़.

ताला बंद… अंदर इलाज चालू! बिना डिग्री, बिना लाइसेंस—चल रहा था पूरा अस्पताल SDM की रेड में खुला खेल—मरीजों की जान से खिलवाड़ करने वालों पर गिरी कार्रवाई की गाज 👉 क्या आपके आसपास भी ऐसे क्लिनिक चल रहे हैं?

News Add crime sks msp
- Advertisement -

- Advertisement -

Neta ji

बनमनखी में आखिरकार प्रशासन की नींद खुली—और खुलते ही जो दिखा, वह किसी मेडिकल व्यवस्था का आईना कम और एक संगठित ‘जुगाड़ तंत्र’ का जीवंत प्रदर्शन ज्यादा लगा। “महर्षि मेंहीं सेवा सदन” जैसे पवित्र नाम के पीछे चल रहा धंधा इस बात का प्रमाण है कि हमारे यहां सेवा का बोर्ड लगाना सबसे आसान है, सेवा करना सबसे कठिन।

 

यहां डॉक्टर कम, ‘डॉक्टरी भावना’ ज्यादा थी—वह भी ऐसी कि बिना डिग्री, बिना लाइसेंस, बिना झिझक। एक युवक चौकी पर बैठकर मरीजों का इलाज कर रहा था, मानो एमबीबीएस की पढ़ाई अब यूट्यूब शॉर्ट्स से पूरी होने लगी हो। और पूछिए मत, जब कागजात मांगे गए तो “माफी मांगने” की डिग्री तुरंत पेश कर दी गई—शायद यही सबसे तेजी से मिलने वाली योग्यता है।

 

प्रशासन की टीम जब सोनार पट्टी पहुंची, तो क्लिनिक का ताला बाहर से बंद था, लेकिन अंदर ‘जीवन रक्षक सेवाएं’ पूरे जोश में चल रही थीं। यह दृश्य अपने आप में एक नया चिकित्सा मॉडल प्रस्तुत करता है—“बंद दरवाजे के पीछे खुली लापरवाही।” ताला तोड़कर अंदर प्रवेश करना पड़ा, जैसे किसी अपराध कथा का क्लाइमेक्स हो। फर्क बस इतना था कि यहां अपराधी कोई काल्पनिक किरदार नहीं, बल्कि मरीजों की जिंदगी से खेलते असली लोग थे।

 

अंदर का हाल और भी ‘प्रेरणादायक’ था—6 मरीज भर्ती, 27 परिजन मौजूद, और चिकित्सा मानकों का नामोनिशान नहीं। एक एएनएम के भरोसे पूरा अस्पताल चल रहा था, मानो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अब ‘वन वुमन शो’ बन चुका हो।

 

अब सवाल उठता है—क्या यह सब अचानक हुआ? क्या प्रशासन को पहले कुछ पता नहीं था? या फिर यह सब वही पुरानी कहानी है—जब तक मामला सुर्खियों में न आए, तब तक सब ‘नियमित’ माना जाता है?

 

News add 2 riya
- Advertisement -

- Advertisement -

Advo
News Add crime sks msp

दरअसल, बनमनखी की यह घटना कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है। यहां दवा दुकानदार डॉक्टर बन बैठे हैं, अल्ट्रासाउंड सेंटर जांच के नाम पर ‘शटर डाउन’ का खेल खेलते हैं, और प्रसव गृह ऐसे चल रहे हैं जैसे कबूतरखाना—भीड़ है, व्यवस्था नहीं।

 

यहां इलाज नहीं, प्रयोग हो रहा है—और मरीज प्रयोगशाला के ‘सब्जेक्ट’ बन चुके हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां कोई रिसर्च पेपर नहीं छपता, बल्कि सीधे श्मशान या कब्रिस्तान की ओर फाइल क्लोज हो जाती है।

 

प्रशासन की इस कार्रवाई की सराहना होनी चाहिए—कम से कम यह संदेश तो गया कि ‘सब कुछ चलता है’ का दौर अब थोड़ा डगमगाने लगा है। लेकिन एक दिन की छापेमारी से वर्षों की लापरवाही खत्म नहीं होती। सवाल यह है कि क्या यह अभियान निरंतर चलेगा, या फिर कुछ दिनों बाद सब फिर से ‘सेटिंग’ में लौट आएगा?

 

स्वास्थ्य सेवा कोई दुकान नहीं, जहां मुनाफा प्राथमिक हो और मानव जीवन सेकेंडरी। लेकिन जमीनी हकीकत यही है—यहां बीमारी से ज्यादा इलाज खतरनाक हो गया है।

 

जरूरत है कि प्रशासन सिर्फ ताला तोड़ने तक सीमित न रहे, बल्कि इस पूरे नेटवर्क को तोड़े—जहां बिना योग्यता के लोग ‘भगवान’ बनने का खेल खेल रहे हैं।

 

वरना अगली बार भी कोई “सेवा सदन” खुलेगा, कोई “मरीज” भर्ती होगा, और कोई “जिंदगी” यूं ही रिस्क पर डाल दी जाएगी—बस नाम बदल जाएगा, कहानी वही रहेगी।

- Advertisement -

- Advertisement -

News Add 3 sks
- Advertisement -

- Advertisement -

SBN self add new reporter
Sampurn Bharat Banner
- Advertisement -

- Advertisement -

- Advertisement -

- Advertisement -