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सच दिखाने का जज्बा

*“सिस्टम की सीढ़ी या सोने की खदान?”: जब अफसर, परिवार और ‘नौकरानी’ सब बन गए करोड़पति.*

किशनगंज के एक SDPO पर 80 करोड़ से अधिक की बेनामी संपत्ति का आरोप सामने आया है। आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की जांच में उनकी पत्नी, कथित प्रेमिका के साथ-साथ घर में काम करने वाली महिला के पास भी करोड़ों की संपत्ति और लग्जरी जीवनशैली के संकेत मिले हैं। छापेमारी में कई संपत्ति दस्तावेज, गहने और महंगी गाड़ियां बरामद हुई हैं। मामले की जांच जारी है और आगे और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।

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Neta ji
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सम्पूर्ण भारत डेस्क:-बिहार में एक बार फिर प्रशासनिक ईमानदारी की परतें उधड़ती नजर आ रही हैं। मामला एक ऐसे पुलिस अधिकारी से जुड़ा है, जिनके इर्द-गिर्द संपत्ति का ऐसा “इकोसिस्टम” विकसित हुआ कि पत्नी, कथित प्रेमिका और यहां तक कि घर में काम करने वाली नौकरानी तक करोड़ों की मालकिन बताई जा रही है। यह घटना केवल सनसनीखेज खबर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है, जहां “सेवा” का पद धीरे-धीरे “संपत्ति सृजन केंद्र” में तब्दील होता जा रहा है।

 

जरा ठहरकर सोचिए—एक ओर आम आदमी गैस सिलेंडर, महंगाई और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर एक सरकारी अफसर के इर्द-गिर्द ऐसा वैभव खड़ा हो जाता है कि उसकी परछाईं में रहने वाले लोग भी अचानक “लखपति से करोड़पति” की श्रेणी में आ जाते हैं। यह किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि हकीकत है—और शायद यही इस कहानी का सबसे बड़ा व्यंग्य है।

 

और कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जिस “नौकरानी” की पहचान आम तौर पर सीमित आय और संघर्ष से जुड़ी होती है, वह लग्जरी गाड़ी से काम पर आती है, करोड़ों का मकान बनवाती है और सोशल मीडिया पर अपनी “रईसी” का प्रदर्शन करती नजर आती है। ऐसे में सवाल उठता है—क्या अब भारत में आर्थिक तरक्की का नया फॉर्मूला यही है कि किसी प्रभावशाली अफसर के करीब पहुंच जाइए?

 

यह पूरा प्रकरण उस तंत्र की पोल खोलता है, जिसमें वर्षों तक सब कुछ “सामान्य” चलता रहता है। जमीन के कागज जमा होते रहते हैं, महंगी गाड़ियां खरीदी जाती हैं, बंगले सजते हैं, लेकिन किसी की नजर नहीं जाती—या शायद नजर जाती है, पर देखने की इच्छा नहीं होती। जब तक मामला सुर्खियों में नहीं आता, तब तक सब कुछ “व्यवस्थित” ही लगता है।

 

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विडंबना यह भी है कि ऐसे अफसरों की छवि अक्सर “कड़क और ईमानदार” की बनाई जाती है। अपराधियों में डर और जनता में भरोसे का जो मुखौटा गढ़ा जाता है, वही धीरे-धीरे सबसे मजबूत ढाल बन जाता है। और इसी ढाल के पीछे पनपता है एक समानांतर साम्राज्य—जिसकी नींव कागजों में नहीं, बल्कि रिश्तों, प्रभाव और सिस्टम की खामियों पर टिकी होती है।

 

इस घटना ने एक और गहरा सवाल खड़ा किया है—क्या हमारी जांच और निगरानी प्रणाली इतनी कमजोर है कि दशकों तक किसी को भनक तक नहीं लगती? या फिर यह मान लिया गया है कि “जब तक पकड़े न जाएं, सब जायज है”? अगर एक अफसर 30 वर्षों में 80 करोड़ की संपत्ति खड़ी कर सकता है, तो यह केवल उसकी “काबिलियत” नहीं, बल्कि सिस्टम की “सहभागिता” भी दर्शाता है।

 

जनता के बीच यह धारणा अब और मजबूत हो रही है कि कानून की सख्ती केवल आम लोगों के लिए है, जबकि रसूखदार लोग नियमों को अपने हिसाब से मोड़ते रहते हैं। यही कारण है कि ऐसे खुलासे केवल आक्रोश ही नहीं, बल्कि अविश्वास भी पैदा करते हैं।

 

व्यंग्य यह है कि जिस व्यवस्था का उद्देश्य समाज में न्याय और पारदर्शिता लाना था, वही व्यवस्था अब खुद सवालों के घेरे में है। और सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह मामला भी कुछ दिनों की सुर्खियों के बाद फाइलों में दब जाएगा, या फिर वास्तव में कोई ऐसा उदाहरण बनेगा जो सिस्टम को भीतर से झकझोर दे?

 

आखिरकार, जनता को “कहानियां” नहीं, जवाब चाहिए। क्योंकि जब नौकरानी करोड़पति बनने लगे और आम आदमी रोजमर्रा के खर्चों में उलझा रहे, तो यह केवल असमानता नहीं—बल्कि व्यवस्था पर एक तीखा व्यंग्य है।

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