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सच दिखाने का जज्बा

“वोट चोरी बनाम वोट भ्रम : मुद्दों की बलि, बयानों की आरती”

✍️ -:संपादकीय व्यंग्य-विश्लेषण:-✍️

Neta ji
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   ✍️ -:संपादकीय व्यंग्य-विश्लेषण:-✍️

बिहार की राजनीति हर चुनाव से पहले एक नया नाटक रचती है। कभी जाति समीकरण की पटकथा, कभी विकास का अधूरा सपना, और इस बार मंचन का नाम है—“वोट चोरी”।

 

छोटे भाई तेजस्वी यादव जनता को चेताते हैं—“लोकतंत्र की जननी बिहार है, हम वोट की चोरी नहीं होने देंगे।” मंच से यह उद्घोष ऐसे गूंजता है जैसे लोकतंत्र को खुद पैडल से चलाना हो। उनकी ‘वोटर अधिकार यात्रा’ ने चुनाव आयोग पर सवालों की बौछार कर दी—आरोप कि वोटर लिस्ट में गड़बड़ी है, ‘जिंदा’ को ‘मरा’ दिखाया जा रहा है। आयोग की सफाई उतनी ही धीमी सुनाई दी, जितनी गर्मी में कूलर की धीमी आवाज़।

 

(पेपर कटिंग:भाष्कर)

उधर बड़े भाई तेजप्रताप यादव का रुख एकदम उल्टा—“भ्रम में मत पड़िए, कोई वोट चोरी नहीं। असली मुद्दा है शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार।” और तो और, उन्होंने राहुल-तेजस्वी की यह यात्रा ही बेमानी बता डाली। परिवार-प्रेम और पार्टी-अनुशासन का यह खुला मुकाबला देखकर जनता को लग रहा है मानो दो दुकानों पर एक ही सामान बिक रहा हो—एक डर के साथ, दूसरी भरोसे के साथ।

 

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राहुल गांधी ने आयोग को घेरा, कहा कि जवाब दो वरना जनता देगी। बीच में राजद के मनोज झा स्पष्टीकरण देते नज़र आए—“कोई बहिष्कार नहीं होगा, चुनाव ज़रूर लड़ेंगे।” यानी डर भी बेचिए, हौसला भी। यही है राजनीति का नया ई-मार्केटप्लेस, जहां बी2सी (बयान टू सिटिजन) मॉडल खूब चमक रहा है।

 

इधर बिहार में चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करने से पहले दलों को अपनी ही बैठकों का मिनिट्स खंगालना चाहिए—कहीं उसमें भी “भ्रम” ही न लिखा हो।

 

“वोट चोरी रोकेंगे” और “कोई चोरी नहीं”—दोनों ही नारे बेस्टसेलर हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि एक डर बेचता है, दूसरा दिलासा। दोनों की एमआरपी—प्राइम टाइम स्लॉट।

 

अंत में जनता कहती है—“एक भाई ताला लगाता है, दूसरा कहता है ताले की ज़रूरत ही नहीं। हम पूछते हैं—ताले की चाबी से नौकरी, अस्पताल और स्कूल भी खुलेंगे या फिर यह सब अगली सभा के वादे पर टल जाएगा?”

 

कुल मिलाकर निष्कर्ष यही है कि:- बिहार का मतदाता फिर वही पुराने तीन दरवाज़ों के सामने खड़ा है—डर, भरोसा और भूल-जाओ। किस दरवाज़े से निकलेगा भविष्य, यह EVM नहीं बताएगी। असली गिनती सिर्फ वोट की नहीं, बल्कि नेताओं की सच्चाई और मुद्दों की ईमानदारी की होनी चाहिए।

अभी के लिए तो लोकतंत्र का दृश्य यही है—
“मुद्दों की लाइट ऑफ, बयानों का साउंड ऑन।”

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