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कफन पर छूट और सिस्टम की चुप्पी-यह दृश्य भारत के विवेक को झकझोरने वाला है…?

"यह संपादकीय केवल एक ख़बर पर प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि पूरे देश के विवेक के लिए एक चेतावनी है। अब समय है कि व्यवस्था जागे—और समाज भी।".............???

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(ADVOCATE S.K.SAMRAT)

देश के कई हिस्सों में पड़ रही कड़ाके की ठंड ने आम जनजीवन को तो प्रभावित किया ही है, लेकिन इससे अधिक चिंता का विषय वह ख़बर है, जिसने हाल के दिनों में पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

पटना के बांसघाट परिसर में अंतिम संस्कार सामग्री बेचने वाली कई दुकानों पर “मरनी का सामान आधे दाम”, “कफन पर विशेष छूट”, और “32 सामान 5000 की जगह 2500” जैसे बोर्ड लगाए गए हैं। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि ठंड बढ़ने के साथ मौतों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, और इसी बढ़ी हुई मांग के बीच दुकानदारों ने “छूट” का रास्ता चुन लिया है।

यह दृश्य न केवल असहज करता है, बल्कि भारतीय समाज और व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी खड़े करता है।बाज़ार का विस्तार अब मृत्यु तक—क्या यही विकास की दिशा है? अख़बारों ने वर्षों तक महंगाई, बेरोज़गारी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और सामाजिक असमानता पर विस्तृत रिपोर्टें प्रकाशित की हैं। लेकिन कफन खरीदने वाले लोगों के लिए भी “डिस्काउंट” का दौर शुरू हो जाएगा—यह शायद किसी ने नहीं सोचा था।

यह सवाल केवल पटना का नहीं है? यह भारतीय समाज के उस बदलते चरित्र का संकेत है, जहाँ बाज़ार अपनी पहुंच अब जीवन की अंतिम दहलीज़ तक फैला चुका है।और इस विस्तार के सामने सरकारी व्यवस्था की भूमिका कहीं नहीं दिखती।

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सिस्टम का मौन सबसे बड़ी विडंबना: हर बार सरकार और प्रशासन आंकड़ों का हवाला देता है-कितने अस्पताल उपलब्ध हैं, कितनी दवाइयाँ स्टॉक में हैं, और कितने लोग सरकारी योजनाओं से लाभान्वित हो रहे हैं। लेकिन यह मौन प्रशासन कौन-सा जवाब देगा कि अगर स्वास्थ्य व्यवस्था वाकई मजबूत है, तो श्मशान घाटों पर भीड़ क्यों बढ़ रही है? क्या यह भी बताया जाएगा कि अंतिम संस्कार सामग्री के “ऑफ़र” किसकी नाकामी का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं? जब ज़िंदा नागरिकों के लिए सुविधाएँ महँगी हो जाएँ और मृत्यु पर ‘छूट’ मिलने लगे, तो यह समझना कठिन नहीं रह जाता कि समस्या मौसम की नहीं,प्रणाली की जड़ता की है।

आर्थिक दोहन का नया रूप : दुख भी अब सौदे की वस्तु:भारतीय परंपरा में अंतिम संस्कार सामग्री को व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा नहीं माना जाता था।यह वह क्षेत्र था जहाँ संवेदना और परंपरा प्रमुख थीं।लेकिन वर्तमान परिदृश्य यह बताता है कि बाज़ार के लिए कोई पवित्रता शेष नहीं बची है। दुकानदारों ने छूट देने का तर्क “गरीबों को राहत” बताया है, लेकिन यह राहत तब और वीभत्स प्रतीत होती है जब इसके पीछे बढ़ी हुई मौतों की व्यावसायिक संभावना दिखने लगती है। किसी भी सभ्य समाज में मौत को अवसर में बदल देना सबसे बड़ा नैतिक पतन माना जाता है।

जनता के विवेक को जाग्रत करने का समय:जब समाज में मृत्यु की कीमत तय होने लगे और सरकारें मौन रहें, तो यह किसी प्रशासनिक खामी से अधिक सामूहिक चेतना के ह्रास का संकेत है। आज आवश्यकता है-स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता देने की, गरीब परिवारों के अंतिम संस्कार की, गरिमा सुनिश्चित करने की,श्मशान घाटों की व्यवस्था दुरुस्त करने की..? और सबसे आवश्यक है- सरकारों को यह समझने की कि विकास का वास्तविक पैमाना नागरिकों का जीवन है, न कि आंकड़ों में दर्ज उपलब्धियाँ।

संवेदना का क्षरण रोकना ही सबसे बड़ा सुधार: कफन पर छूट का बोर्ड सिर्फ एक पोस्टर नहीं बल्कि यह भारतीय व्यवस्था की एक त्रासद सच्चाई है। यह हमें याद दिलाता है कि, यदि सरकारें स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन और सामाजिक सुरक्षा को गंभीरता से न लें, तो आने वाले समय में ऐसे दृश्य केवल एक शहर की समस्या नहीं रहेंगे-बल्कि पूरे देश की सामूहिक शर्म बन जाएंगे। अंततः प्रश्न यही है—क्या हम ऐसा भारत चाहते हैं, जहाँ जीवन संघर्ष हो और मृत्यु में भी बाज़ार का हस्तक्षेप?

“यह संपादकीय केवल एक ख़बर पर प्रतिक्रिया नहीं,बल्कि पूरे देश के विवेक के लिए एक चेतावनी है। अब समय है कि व्यवस्था जागे—और समाज भी।”

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