सम्पूर्ण भारत | संपादकीय
सरकारी अनुज्ञप्ति कोई बिकाऊ माल नहीं और जनता की मजबूरी किसी कर्मचारी की कमाई का जरिया नहीं हो सकती। बनमनखी में PDS अनुज्ञप्ति के नाम पर कथित रिश्वतखोरी और फर्जी प्रमाणपत्रों से जुड़े मामले ने सरकारी व्यवस्था के भीतर चल रही कथित अनियमितताओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अच्छी बात यह है कि इस बार प्रशासन ने सवालों से मुंह नहीं मोड़ा, बल्कि जांच बैठाई और जांच रिपोर्ट के आधार पर प्राथमिकी तक कार्रवाई पहुंची। मामले में तीन लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज होना और सरकारी कर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होना निश्चित रूप से एक कड़ा प्रशासनिक संदेश है। लेकिन असली परीक्षा अब शुरू हुई है।
कुर्सी सरकारी है तो जवाबदेही भी सरकारी होगी:
PDS की अनुज्ञप्ति पाने के लिए यदि किसी आवेदक से कथित रूप से पैसे की मांग की जाती है तो यह महज लेन-देन का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था पर चोट है जिसके भरोसे आम नागरिक सरकारी प्रक्रिया में अपना आवेदन करता है। प्रशासनिक कार्यालय जनता की सेवा के लिए हैं। वहां पहुंचने वाले व्यक्ति को यह भय नहीं होना चाहिए कि बिना पैसे दिए उसका काम आगे नहीं बढ़ेगा। यही कारण है कि इस मामले में हुई कार्रवाई को केवल तीन लोगों तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। पूरी प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए—कहां से आवेदन शुरू हुआ, किस स्तर पर दस्तावेज देखे गए, मेधा सूची कैसे बनी और अनुज्ञप्ति जारी करने तक किस-किस स्तर पर निर्णय हुआ।
फर्जी प्रमाणपत्र वालों के लिए भी साफ संदेश जरूरी
मामले का दूसरा पहलू और भी गंभीर है। यदि PDS अनुज्ञप्ति हासिल करने के लिए किसी ने फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र का इस्तेमाल किया है तो यह वास्तविक अभ्यर्थियों के अधिकार पर सीधा प्रहार है। प्रशासन द्वारा मूल प्रमाणपत्रों के मिलान और संबंधित बोर्ड, विश्वविद्यालय या संस्थान से सत्यापन का निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है। कागज देखकर मुहर लगाने की पुरानी कार्यशैली अब नहीं चलेगी। प्रमाणपत्र असली है तो रिकॉर्ड में भी असली होना चाहिए। यदि जांच में कोई प्रमाणपत्र फर्जी पाया जाता है तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं किसी निर्दोष अभ्यर्थी को केवल संदेह के आधार पर परेशान करना भी उचित नहीं होगा। जांच का पैमाना एक ही होना चाहिए—निष्पक्षता।
FIR शुरुआत है, अंतिम कार्रवाई नहीं
यहां प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि कार्रवाई बीच रास्ते में न रुक जाए। प्राथमिकी दर्ज होना स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन जनता अब आगे का परिणाम देखना चाहती है।
- क्या पुलिस जांच पूरी गति से आगे बढ़ेगी?
- क्या विभागीय जांच समय पर पूरी होगी?
- क्या कथित अवैध वसूली के पूरे नेटवर्क की पड़ताल होगी?
- क्या फर्जी प्रमाणपत्रों की जांच में वास्तविकता सामने आएगी?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा पैदा न हो, इसके लिए व्यवस्था में बदलाव किया जाएगा? इन सवालों का जवाब कार्रवाई की अगली कड़ी देगी।
डीएम की सख्ती से उम्मीद जगी है, अब सिस्टम को बदलना होगा
जिलाधिकारी अंशुल कुमार के निर्देश पर जांच दल का गठन और उसके बाद प्राथमिकी की कार्रवाई ने आम लोगों में यह उम्मीद पैदा की है कि शिकायतों को अब गंभीरता से लिया जा सकता है। लेकिन किसी भी प्रशासन की सख्ती की असली पहचान सिर्फ छापेमारी, FIR या गिरफ्तारी नहीं होती। असली सफलता तब मानी जाएगी जब भ्रष्टाचार की गुंजाइश पैदा करने वाली व्यवस्था ही कमजोर कर दी जाए। PDS अनुज्ञप्ति की प्रक्रिया में आवेदन से लेकर अंतिम अनुज्ञप्ति तक प्रत्येक चरण पारदर्शी होना चाहिए। मेधा सूची सार्वजनिक हो, दस्तावेजों का सत्यापन अनिवार्य हो और आवेदक को अपने आवेदन की स्थिति जानने का स्पष्ट माध्यम मिले।
अब जनता देख रही है
बनमनखी का यह मामला अब केवल एक प्रशासनिक फाइल नहीं रह गया है। यह उस भरोसे की परीक्षा है जो आम आदमी सरकारी व्यवस्था पर करता है। अगर आरोप गलत हैं तो जांच उन्हें साफ करे और अगर आरोप सही पाए जाते हैं तो कानून अपना काम करे। यही निष्पक्ष प्रशासन है। जनता को न किसी के खिलाफ बदले की कार्रवाई चाहिए, न किसी के पक्ष में संरक्षण। जनता को चाहिए एक ऐसी व्यवस्था जहां पात्रता के आधार पर अधिकार मिले और रिश्वत की कथित मांग के लिए कोई जगह न हो। बनमनखी में कार्रवाई ने उम्मीद जगाई है। अब जरूरत है कि यह उम्मीद परिणाम में बदले।क्योंकि सवाल सिर्फ PDS अनुज्ञप्ति का नहीं है—सवाल है कि सरकारी व्यवस्था में जनता की कीमत उसकी पात्रता तय करेगी या उसकी जेब? इस सवाल का जवाब अब प्रशासन की अगली कार्रवाई से मिलना चाहिए।