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*पूर्णिया के चित्रकार राजीव राज : कोसी से दुनिया तक की कला यात्रा.*

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पूर्णिया (बिहार):-बिहार की सांस्कृतिक धरोहर कोसी की धरती ने ऐसे कलाकार को जन्म दिया है, जिसने अपनी तूलिका और कल्पना के रंगों से न केवल कोसी की धारा को अमर कर दिया, बल्कि विश्वस्तरीय कला जगत में भी पहचान बनाई। यह गौरवशाली यात्रा है — चित्रकार राजीव राज की।

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प्रारंभिक पहचान: राजीव राज की कला यात्रा की शुरुआत वर्ष 1999 में हुई, जब उनकी पेंटिंग बिहार सांस्कृतिक महोत्सव – 99 में प्रदर्शित हुई और चर्चित अख़बार The Indian Nation के फ्रंट पेज पर छपी। यही उनके करियर का पहला सरकारी मान्यता प्राप्त मुकाम था। वर्ष 2007 में उन्होंने “अधूरी तस्वीर” फ़िल्म बनाई, जो एक चित्रकार की भावनाओं और संघर्ष पर आधारित थी।

कोसी पेंटिंग और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान: 2006 से उन्होंने कोसी पेंटिंग शैली पर काम शुरू किया। वर्ष 2008 की कोसी त्रासदी के दौरान बनाई गई उनकी 40 से अधिक पेंटिंग्स ने पूरे देश का ध्यान खींचा। 2011 में उन्होंने पूर्णिया जिला का आधिकारिक लोगो डिज़ाइन किया और 2012 में राष्ट्रीय युवा उत्सव में उनकी कला की धूम रही।

विश्व रिकॉर्ड और सम्मान: 2018 में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की 37.6×37.6 फुट की पेंटिंग मात्र 31 घंटे में बनाकर लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज कराया। 2019-20 में उन्होंने विश्व की सबसे बड़ी पज़ल पोर्ट्रेट बनाई, जिसे एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने मान्यता दी। उन्हें बिहार का सर्वश्रेष्ठ कला पुरस्कार और राधा मोहन कला पुरस्कार भी मिला।

अंतर्राष्ट्रीय पहचान और शैक्षिक योगदान: उनकी कोसी पेंटिंग्स का प्रदर्शन स्विट्ज़रलैंड, टोक्यो और दुबई जैसे देशों में हुआ। उन्होंने “कौशिकी” नामक पुस्तक लिखी, जिसे प्रशासनिक मान्यता प्राप्त हुई। 2021 में BPSC परीक्षा में उनके ऊपर आधारित प्रश्न पूछा गया और 2022 में उनकी पेंटिंग विश्व की सर्वश्रेष्ठ 10 पेंटिंग्स में शामिल हुई।

वर्तमान और भविष्य: वर्तमान में राजीव राज “कोसी पेंटिंग प्रोजेक्ट” और “Union of Souls” श्रृंखला पर कार्यरत हैं। उनकी संस्था Arteteria (पूर्णिया) कला, शिक्षा और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बन रही है, जो भविष्य में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बिहार का नाम रोशन करेगी।

चित्रकार राजीव राज की यात्रा इस बात का प्रमाण है कि यदि जुनून और लगन हो तो कोसी की धारा से निकलकर कोई कलाकार दुनिया की कला-धारा का हिस्सा बन सकता है।

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