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मौत की धूल और पलायन का दर्द, क्या गरीब मजदूरों की जिंदगी इतनी सस्ती है?
पूर्णिया जिले के कसबा प्रखंड स्थित जियनगंज गांव में आंध्र प्रदेश की एक पाउडर फैक्ट्री में काम कर लौटे प्रवासी मजदूरों की रहस्यमयी फेफड़ों की बीमारी ने दहशत फैला दी है। अब तक चार मजदूरों की मौत हो चुकी है, जबकि सात अन्य जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। परिजनों का आरोप है कि फैक्ट्री की जहरीली धूल ने उनके अपनों के फेफड़ों को बर्बाद कर दिया। इस दर्दनाक घटना ने सीमांचल में पलायन, श्रमिक सुरक्षा और मजदूरों के शोषण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सम्पूर्ण भारत की विशेष पड़ताल में पढ़िए— आखिर कैसे रोजगार की तलाश में गया एक गांव मौत और बीमारी की त्रासदी में बदल गया।


पूर्णिया जिले के कसबा प्रखंड स्थित जियनगंज गांव से सामने आई दर्दनाक तस्वीर ने पूरे सीमांचल को झकझोर दिया है। रोजगार की तलाश में आंध्र प्रदेश गए मजदूरों की लगातार हो रही मौतें केवल एक स्वास्थ्य संकट नहीं हैं, बल्कि यह उस सामाजिक और आर्थिक विफलता का आईना है, जिसने लाखों युवाओं को घर-परिवार छोड़कर हजारों किलोमीटर दूर जाने के लिए मजबूर कर दिया है।
जब किसी मां को यह कहना पड़े कि “पत्थर तोड़ने वाली फैक्ट्री में काम करते-करते मेरे बेटे का फेफड़ा भी पत्थर हो गया”, तब यह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था के लिए एक गंभीर सवाल बन जाता है।
जियनगंज और आसपास के गांवों से दो दर्जन से अधिक युवक रोजगार के लिए आंध्र प्रदेश गए थे। वे बेहतर जिंदगी, परिवार की खुशहाली और बच्चों के भविष्य के सपने लेकर निकले थे। लेकिन आज कई परिवारों के घरों में कमाई नहीं, बल्कि बीमारी और मौत लौटी है। चार मजदूरों की मौत हो चुकी है और कई अन्य अस्पतालों में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि फैक्ट्री में मजदूरों की सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम थे, तो इतने कम समय में इतनी बड़ी संख्या में लोग गंभीर फेफड़ों की बीमारी की चपेट में कैसे आ गए? क्या उन्हें मास्क, सुरक्षा उपकरण और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं? यदि नहीं, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

यह मामला केवल एक फैक्ट्री या एक राज्य तक सीमित नहीं है। यह पूरे देश में फैले उस श्रमिक पलायन की कहानी है, जिसमें गरीब परिवारों के बेटे रोजगार के लिए घर छोड़ते हैं और अक्सर शोषण, असुरक्षित कार्यस्थलों तथा अमानवीय परिस्थितियों का सामना करते हैं। दुखद यह है कि जब तक कोई बड़ी दुर्घटना या मौत नहीं होती, तब तक इन मजदूरों की सुध लेने वाला कोई नहीं दिखता।
सीमांचल जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का अभाव भी इस त्रासदी का एक बड़ा कारण है। यदि स्थानीय स्तर पर उद्योग, रोजगार और स्वरोजगार के पर्याप्त साधन उपलब्ध होते, तो शायद इन युवाओं को अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर परदेस नहीं जाना पड़ता। आज भी सीमांचल के हजारों परिवार छह महीने गांव और छह महीने परदेस की जिंदगी जीने को मजबूर हैं।
सरकार और प्रशासन को इस मामले की उच्चस्तरीय जांच करानी चाहिए। मृतक मजदूरों के परिवारों को उचित मुआवजा, बीमार मजदूरों को बेहतर इलाज और दोषी पाए जाने पर संबंधित फैक्ट्री प्रबंधन तथा ठेकेदारों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि कहीं अन्य मजदूर भी इसी तरह की बीमारी की चपेट में तो नहीं हैं।
जियनगंज की यह त्रासदी केवल चार मौतों की कहानी नहीं है। यह उन अनगिनत परिवारों की पीड़ा है, जिनके सपने रोजगार की तलाश में घर से निकलते हैं और कई बार लाश बनकर लौटते हैं।
यदि इस घटना से भी व्यवस्था नहीं जागी, तो आने वाले दिनों में न जाने कितने और जियनगंज, कितने और मशद, कुंदन, अरविंद और मुस्तफा इतिहास के पन्नों में एक आंकड़ा बनकर रह जाएंगे।
सम्पूर्ण भारत की राय: “रोजगार की तलाश में घर छोड़ने वाला मजदूर देश की अर्थव्यवस्था का आधार है। उसकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान सुनिश्चित करना केवल सरकार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। जियनगंज की यह घटना एक चेतावनी है—यदि श्रमिकों की सुरक्षा को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो विकास की चमक के पीछे छिपी यह मौत की धूल और भी कई परिवारों के चिराग बुझा सकती है।”







