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पूर्णियाँ के सरसी में एक ऐसा मंदिर जहाँ विगत 158 वर्ष से लगातार हो रही माँ दुर्गा की पूजा.

Neta ji
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पूर्णियां(बिहार):-आध्यात्मिक दृष्टिकोण से प्रसिद्ध सरसी गांव के सिद्ध दात्री दुर्गा मंदिर परिसर में दुर्गा पूजा की तैयारी पूरी कर ली गयी है. करीब डेढ़ सौ वर्षों से यहां होती चली आ रही दुर्गा पूजा को लेकर इस बार भी स्थानीय मूर्तिकार के द्वारा प्रतिमा निर्माण के बाद माँ दुर्गा की पट खोल दिया गया है. पूजा-अर्चना पर इस वर्ष करीब लाखों रुपये व्यय होने का अनुमान है. पूजा के लिए सामुहिक रूप से चंदा की व्यवस्था की जाती है. सरसी गांव स्थित इस मंदिर में सिद्ध दात्री दुर्गा की प्रतिमा के अलावा श्री गणेश,कार्तिक, भगवती,सरस्वती,लक्ष्मी, रंगी व भंगी की स्थापित है.इस मंदिर में मैथिल रीती रिवाज से पूजा की जाती है. यहां माता की पूजा-अर्चना के लिए दूरदराज के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का आगमन होता है.

 

क्या है मंदिर का इतिहास:-

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सिद्ध दात्री दुर्गा मंदिर कमिटी के अध्यक्ष ने बताया की सरसी में एक भी देवी देवता का मंदिर नहीं था तब स्थानीय ग्रामीणों ने वर्ष 1863 में मंदिर बनाने का सर्वसम्मति से विचार रखा. वर्ष 1865 में एक फूस का घर बना कर मंदिर को स्थापित कर पूजा अर्चना शुरू की गयी.उन्होंने बताया कीवर्ष 1870 -80 के बिच यहाँ पर जनसहयोग से भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया. सुन्दरता में यह मंदिर पूरा जिला का एकलोता मंदिर है.उन्होंने बताया कि इस मंदिर की सेवा के उदेश्य से माँ की एक दासी करीब दस वर्षों तक यहाँ रह कर सेवा की. उसके समय में प्रतिदिन पुरे बिहार से दस हजार से अधिक विभिन्न रोगों से पीड़ित लोग यहाँ आकर भस्म ले जाते थे.बताया जा रहा है की दासी के हाथों से दी गयी भस्म को लगते हीं लोगों के सभी कष्ट छन भर में दूर हो जाते थे. बाद में अत्यधिक लोगों के आने से यहाँ काफी गंदिगी व संक्रमण बढ़ने लगा जिसके चलते ग्रामीणों ने बाहर के भक्तों को मंदिर आने पर रोक लगा दिया.जिसकी शिकायत चम्पानगर के राजा से की गयी.तब चम्पानगर के राजा कुमार श्यामानंद सिंह ने सरसी के लोगों को समझा बुझा कर शांत किया. सप्ताह में एक दिन प्रत्येक रविवार को पूजा अर्चना करने का नियम बना दिया गया जो आज तक कायम है.

*मेला में स्थनीय युवाओ के अभिनय देखने दूर दराज से आते थे लोग:-

स्थानीय लोगों ने बताया की सरसी गांव स्थित लगने वाला मेला में वर्षों से नाटक मंचन किया जाता था. जिसमे स्थानीय युवाओं के द्वारा राजा हरिश्चंद्र,कच्चा धागा, आदि का मंचन किया करते थे.इस अभिनय को देखने के लिए आस पास के इलाके के लोग उम्र पड़ते थे. वर्ष 2016 से इस अभिमन्य को बंद कर दिया गया. बहरहाल समिति के अध्यक्ष,सचिव एवं सदस्य पूर्व मुखिया बन्दना सिंह सहित अन्य ग्रामीण पूजा आयोजन व संचालन में पूरी तन्मयता के साथ जुटे हुए हैं.

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