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23 अगस्त 1999: इतिहास का दर्द, संघर्ष का संकल्प।

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✍ लेखक – रवि प्रताप वर्मा, प्रतापगढ़ ✍

“जहाँ लाठी टूटी, वहीं विचार अटूट हो गए।”

सत्ता का बर्बर चेहरा:-23 अगस्त 1999 — यह तारीख़ केवल कैलेंडर पर अंकित एक दिन नहीं, बल्कि समाज की रगों में दर्ज वह घाव है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता।
उस दिन सत्ता के इशारे पर डॉ. सोनेलाल पटेल जी पर इतना बर्बर लाठीचार्ज हुआ कि उनका पूरा शरीर अधमरा हो गया।

इलाज की जगह जेल की सलाखें: टूटी हुई हड्डियाँ, खून से सना शरीर और कराहती सांसें… यह दृश्य किसी भी संवेदनशील हृदय को झकझोर देने के लिए काफी था। मगर इंसाफ़ और इलाज देने के बजाय उन्हें उसी हालत में जेल की अंधेरी सलाखों के पीछे धकेल दिया गया। यह सिर्फ एक इंसान के साथ ज्यादती नहीं थी, बल्कि पूरे पिछड़े, दलित और वंचित समाज की आवाज़ को कुचलने की साज़िश थी।

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संघर्ष की विरासत: इतिहास गवाह है—जिसे सत्ता ने अधमरा कर जेल में डाल दिया, वही आज करोड़ों दिलों में ज़िंदा है।डॉ. पटेल का सपना और उनका संघर्ष आज भी समाज को नई दिशा दे रहा है। उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प उनकी बेटी, अपना दल (सोनेलाल) की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल जी ने निभाया है। उन्होंने अन्याय के हर रूप के खिलाफ डटकर आवाज़ बुलंद की और यह साबित किया कि पिता का सपना कभी अधूरा नहीं रहेगा।

स्मृति से संकल्प तक:-आज 23 अगस्त केवल स्मृति भर नहीं है, यह संकल्प का प्रतीक है।
कि डॉ. सोनेलाल पटेल जी का सपना पूरा होगा और उनका संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाएगा। यह दिन हमें यह भी याद दिलाता है कि—

“सपने भले ही सत्ता के डंडों से घायल हो सकते हैं,
लेकिन उनके विचार कभी मर नहीं सकते।

📝 नोट: इस लेख में वर्णित बातें लेखक का अपना विचार हैं।

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