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*बनमनखी की राजनीति का मौन रणनीतिकार, मंच पर नेता, पर्दे के पीछे चलता है दिमाग.*

#पूर्णिया जिले की बनमनखी विधानसभा की राजनीति अक्सर एक नाम के इर्द-गिर्द घूमती रही है— कृष्ण कुमार ऋषि। लेकिन इस लगातार जीत की श्रृंखला के पीछे एक ऐसा चेहरा भी मौजूद है, जो मंच पर कम और रणनीति में अधिक दिखाई देता है। स्थानीय लोग उसे आधे मज़ाक, आधे सम्मान और पूरी गंभीरता के साथ “चाणक्य अमितेश कुमार सिंह” कहते हैं।

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पूर्णिया (बिहार):पूर्णिया जिले की बनमनखी विधानसभा की राजनीति अक्सर एक नाम के इर्द-गिर्द घूमती रही है— कृष्ण कुमार ऋषि। लेकिन इस लगातार जीत की श्रृंखला के पीछे एक ऐसा चेहरा भी मौजूद है, जो मंच पर कम और रणनीति में अधिक दिखाई देता है। स्थानीय लोग उसे आधे मज़ाक, आधे सम्मान और पूरी गंभीरता के साथ “चाणक्य अमितेश कुमार सिंह” कहते हैं। यह कहानी उसी अदृश्य, लेकिन निर्णायक राजनीतिक दिमाग की है, जिसने सिर्फ़ एक विधायक नहीं, बल्कि बनमनखी में एक राजनीतिक परंपरा को आकार दिया।

विद्यार्थी परिषद से राजनीति की प्रयोगशाला तक:अमितेश कुमार सिंह का राजनीतिक संस्कार विद्यार्थी जीवन में ही गढ़ चुका था। ABVP (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) की सक्रिय इकाई में रहते हुए उन्होंने न केवल आंदोलन, संगठन और नेतृत्व का व्यावहारिक अनुभव लिया, बल्कि यह भी सीखा कि किस क्षण कौन-सा मोहरा आगे बढ़ाना है। कहा जाता है—यहीं उनके भीतर का रणनीतिकार जन्मा। इन्हीं दिनों एक युवा, ऊर्जा से भरा चेहरा—कृष्ण कुमार ऋषि—उनकी निगाहों में आया।लोकल संगठन के मंचों पर ऋषि की वाक्शक्ति, जनसंपर्क और त्वरित निर्णयशीलता ने अमितेश को संकेत दे दिया कि यह युवा आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक कैंडिडेट बन सकता है।

साल 2000: वह मुलाकात जिसने दिशा बदल दी: स्थानीय राजनीति में यह प्रसंग आज भी फुसफुसाहट में सुना जाता है—अमितेश ने ऋषि को विद्यार्थी परिषद के वरिष्ठ मार्गदर्शक, सहरसा निवासी प्रो. राम नरेश सिंह से मिलवाया।यह मुलाकात जितनी साधारण दिखती थी, उतनी ही असाधारण साबित हुई।यहीं से भाजपा की मुख्यधारा में ऋषि के लिए रास्ते खुलने लगे—टिकट, संगठन का भरोसा और चुनावी युद्धभूमि में प्रवेश। इन सबके पीछे अमितेश की पर्दे के पीछे चलती रणनीति निर्णायक रही।इसी दौर में स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच एक कहावत चल पड़ी—“मंच पर ऋषि हैं, पर खेल अमितेश का चलता है।”

चुनावी जीतों का गणित: जहाँ रणनीति ने नेतृत्व को गढ़ा:समय बदला, चुनाव बदले, विरोधी बदले—लेकिन एक चीज़ नहीं बदली: बनमनखी में कृष्ण कुमार ऋषि की जीत की परंपरा।इन लगातार जीतों के पीछे अमितेश कुमार सिंह की कुछ प्रमुख रणनीतियाँ हमेशा चर्चा में रहीं—

▪ बूथ प्रबंधन की अभेद योजना
अमितेश का स्पष्ट मानना था—“चुनाव मंच पर नहीं, बूथ पर जीते जाते हैं।”उन्होंने हर बूथ पर ऐसा स्थायी नेटवर्क तैयार किया, जिसे चुनावी मौसम में केवल सक्रिय करना पड़ता था।

▪ विरोधियों को निष्प्रभावी करने की ‘साइलेंट पॉलिटिक्स’:सीधी भिड़ंत के बजाय साइलेंट कूटनीति, सही समय पर सटीक वार और विपक्ष की कमजोर कड़ियों पर पैनी नज़र—यही उनकी रणनीति का मूल रहा।

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▪ ‘ऋषि’ ब्रांड का निर्माण:अमितेश ने विधायक को एक स्थानीय ब्रांड के रूप में स्थापित किया—“उपलब्ध नेता”, “अपने इलाके का आदमी”, “हमेशा मोबाइल ऑन”—
ये विशेषण चुनावी राजनीति में बड़े हथियार साबित हुए।

सत्ता के गलियारों में प्रवेश: सुशील मोदी वाला अध्याय:-कहानी यहीं और रोचक हो जाती है।भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं तत्कालीन प्रदेश संगठन महामंत्री हरेन्द्र पांडेय—जो स्वयं विद्यार्थी परिषद की पृष्ठभूमि से संघ के माध्यम से भाजपा में आए—और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी से विद्यार्थी परिषद काल के दौरान अमितेश के मजबूत संपर्क स्थानीय राजनीति में लंबे समय तक चर्चा का विषय रहे।इन्हीं राजनीतिक समीकरणों और प्रभावों के परिणामस्वरूप कृष्ण कुमार ऋषि को दो बार बिहार सरकार में मंत्री बनने का अवसर मिला।हालाँकि मंत्री बनना कई कारकों का परिणाम होता है, लेकिन स्थानीय लोगों का मानना है—“दिल्ली-पटना की राजनीति में ऋषि की पहुँच जितनी दिखती है, उससे दोगुनी अमितेश की रणनीति में छिपी होती है।”

मौन रहते हुए भी केंद्र में: ‘चाणक्य’ की पहचान:अमितेश कुमार सिंह की सबसे दिलचस्प विशेषता यही है कि वे शायद ही कभी कैमरे के सामने आते हों।फोटो में कम दिखते हैं, लेकिन निर्णायक बैठकों में उनकी मौजूदगी तय मानी जाती है।उनके बारे में कहा जाता है कि वे राजनीति को शतरंज की तरह खेलते हैं—हर चाल के पीछे कई चालें छिपी रहती हैं।विपक्ष उनकी रणनीति समझते-समझते पिछड़ जाता है।शायद यही कारण है कि बनमनखी की राजनीति में वे “चाणक्य” कहे जाते हैं—बोलकर नहीं, करके।

आज का समय: जब रणनीतिकार ही धुरी बन जाता है:आज कृष्ण कुमार ऋषि क्षेत्र में मजबूत नेतृत्व का चेहरा हैं।लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उनके राजनीतिक सफर की परतें खोलने पर अंदर अमितेश कुमार सिंह जैसे रणनीतिक दिमाग की छाप साफ दिखाई देती है।संगठन निर्माण से लेकर चुनावी मोर्चों तक,कैबिनेट तक पहुँच से लेकर स्थानीय समीकरणों को संतुलित रखने तक—अमितेश की भूमिका एक अदृश्य रीढ़ की तरह रही है।

लगातार छह जीतों का रिकॉर्ड:प्रदेश में गिने-चुने लोगों को छोड़ दें, तो बनमनखी विधानसभा से लगातार छह बार इलेक्शन एजेंट रहते हुए जीत दिलाने का रिकॉर्ड अमितेश कुमार सिंह के नाम दर्ज है।यह न सिर्फ जिला, बल्कि पूरे बिहार में एक अलग कृतिमान माना जाता है—जिसकी चर्चा अब लोग खुलकर करने लगे हैं। शायद यही किसी सच्चे राजनीतिक चाणक्य की असली पहचान होती है—
वह इतिहास बनाता है, लेकिन खुद इतिहास के पन्नों में शोर नहीं करता।

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