Sampurn Bharat
सच दिखाने का जज्बा

*फर्जी प्रमाणपत्रों की परतें और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल.*

#बिहार की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर कठघरे में है। नियोजित शिक्षकों की योग्यता जांच में सामने आया फर्जीवाड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि यह पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है।

Neta ji
- Advertisement -

- Advertisement -

News Add crime sks msp

बिहार की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर कठघरे में है। नियोजित शिक्षकों की योग्यता जांच में सामने आया फर्जीवाड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि यह पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है।

 

निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की जांच में वर्ष 2006 से 2015 के बीच बहाल 2,912 शिक्षकों के शैक्षणिक प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाना और अब तक 1,707 एफआईआर दर्ज होना, इस बात का संकेत है कि यह मामला कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं, बल्कि एक संगठित और दीर्घकालिक गड़बड़ी का परिणाम है।

पटना हाईकोर्ट के निर्देश पर चल रही इस व्यापक जांच में अब तक 6,46,796 शिक्षकों के मूल दस्तावेजों की छानबीन पूरी की जा चुकी है। यह आंकड़ा अपने-आप में बताता है कि वर्षों तक बिना प्रभावी सत्यापन के नियुक्तियां होती रहीं। निगरानी ब्यूरो के डीजी जे.एस. गंगवार के अनुसार, जांच अभी जारी है और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाएगी। स्पष्ट है कि आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ सकती है।

Advo
News add 2 riya
News Add crime sks msp
- Advertisement -

- Advertisement -

यह मामला केवल नौकरी जाने या एफआईआर तक सीमित नहीं है। जिन शिक्षकों के प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए हैं, उनके खिलाफ वेतन वसूली और कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू हो सकती है। सवाल यह भी है कि जिन बच्चों को इन शिक्षकों ने पढ़ाया, उनकी शिक्षा की गुणवत्ता और भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा? शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यदि अयोग्य लोग वर्षों तक कार्यरत रहे, तो इसका दुष्प्रभाव समाज पर दूरगामी होगा।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह फर्जीवाड़ा किसी एक जिले या एक भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं दिखता। जांच के दौरान फर्जी डिग्री और प्रमाणपत्र जारी करने वाले रैकेट, कुछ बोर्डों और संस्थानों की भूमिका भी संदेह के घेरे में आई है। यह सीधे तौर पर उस तंत्र की विफलता को दर्शाता है, जहां सत्यापन की जिम्मेदारी निभाने वाले विभागों ने या तो आंखें मूंदे रखीं या मिलीभगत निभाई।

अब जरूरत है कि सरकार इस मामले को केवल दंडात्मक कार्रवाई तक सीमित न रखे। भर्ती प्रक्रिया में स्थायी और तकनीकी रूप से मजबूत सत्यापन प्रणाली, विश्वविद्यालयों और बोर्डों का डिजिटल रिकॉर्ड, तथा नियुक्ति से पहले शत-प्रतिशत प्रमाणिकता सुनिश्चित करना अनिवार्य किया जाए। साथ ही, जिन अधिकारियों की लापरवाही या संलिप्तता सामने आए, उन पर भी उतनी ही सख्ती होनी चाहिए, जितनी फर्जीवाड़ा करने वालों पर।

यह प्रकरण एक चेतावनी है—यदि शिक्षा व्यवस्था की नींव कमजोर होगी, तो राज्य का भविष्य भी डगमगाएगा। समय आ गया है कि बिहार में शिक्षक बहाली को लेकर पारदर्शिता, जवाबदेही और गुणवत्ता को सिर्फ नारे नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारा जाए। तभी शिक्षा व्यवस्था पर जनता का भरोसा बहाल हो सकेगा।

- Advertisement -

- Advertisement -

News Add 3 sks
- Advertisement -

- Advertisement -

SBN self add new reporter
- Advertisement -

- Advertisement -

Sampurn Bharat Banner
SBN self add new reporter