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*कुर्सी से ज्यादा सड़क पर—पप्पू यादव की राजनीति का पूरा सफ़र.*

#कोशी–सीमांचल की राजनीति में कुछ चेहरे चुनावी नतीजों से पहचाने जाते हैं, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिनकी पहचान भीड़, भरोसे और संकट में मौजूदगी से बनती है। Rajesh Ranjan (Pappu Yadav) इसी दूसरी श्रेणी के नेता हैं। आज उनके जन्मदिवस पर जब समर्थक उन्हें “गरीबों का मसीहा” और “जन-जन की आवाज़” कहते हैं, तो यह केवल नारा नहीं, बल्कि तीन दशक से अधिक लंबे राजनीतिक जीवन का सार है—जिसमें सत्ता, संघर्ष, विवाद और वापसी, सब कुछ शामिल है।

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पूर्णिया(बिहार):-कोशी–सीमांचल की राजनीति में कुछ चेहरे चुनावी नतीजों से पहचाने जाते हैं, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिनकी पहचान भीड़, भरोसे और संकट में मौजूदगी से बनती है। Rajesh Ranjan (Pappu Yadav) इसी दूसरी श्रेणी के नेता हैं। आज उनके जन्मदिवस पर जब समर्थक उन्हें “गरीबों का मसीहा” और “जन-जन की आवाज़” कहते हैं, तो यह केवल नारा नहीं, बल्कि तीन दशक से अधिक लंबे राजनीतिक जीवन का सार है—जिसमें सत्ता, संघर्ष, विवाद और वापसी, सब कुछ शामिल है।

गांव से राजनीति तक की जमीन: पप्पू यादव का जन्म कोशी–सीमांचल अंचल में हुआ। यही इलाका उनकी राजनीति की प्रयोगशाला बना। छात्र जीवन से ही स्थानीय मुद्दों, सामाजिक असमानता और प्रशासनिक अन्याय के खिलाफ मुखर रहना उनकी पहचान बनी। राजनीति उनके लिए केवल चुनावी गणित नहीं रही, बल्कि स्थानीय पीड़ा का त्वरित समाधान उनका स्थायी एजेंडा बन गया। यही वजह है कि शुरुआती दौर में ही वे युवाओं और हाशिए के वर्गों के बीच लोकप्रिय होने लगे।

तेज़ उभार: विधानसभा से संसद तक: 1990 के दशक की शुरुआत बिहार की राजनीति में उथल-पुथल का दौर था। इसी दौर में पप्पू यादव ने विधानसभा से लेकर लोकसभा तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। संसद पहुँचना उनके लिए उपलब्धि जरूर थी, लेकिन उनकी असली राजनीति संसद भवन से ज्यादा सड़क, चौक-चौराहे और बाढ़-पीड़ित गांवों में दिखाई देती रही। समर्थक बताते हैं कि वे नेता कम और संकटमोचक ज्यादा दिखे।

पार्टी बदली, पहचान नहीं: उनके राजनीतिक सफ़र की सबसे अनोखी विशेषता यह रही कि पार्टी बदलती रही, लेकिन वोटर का भरोसा पूरी तरह नहीं टूटा। वे कभी किसी दल के साथ रहे, कभी अलग राह चुनी, तो कभी अपनी पार्टी बनाई। यह बिहार की राजनीति में दुर्लभ उदाहरण है, जहाँ नेता से ज्यादा पार्टी का चेहरा भारी पड़ता है। पप्पू यादव के मामले में अक्सर उलटा हुआ—पार्टी उनकी सवारी बनी, पहचान उनकी अपनी रही।

सबसे बड़ा उतार: विवाद, सजा और जेल: उनके जीवन का सबसे कठिन दौर वह रहा जब वे गंभीर आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के बाद जेल गए। यह वह समय था जब राजनीतिक विश्लेषक मान रहे थे कि उनका करियर समाप्ति की ओर है। लेकिन राजनीति में हर कहानी सीधी रेखा में नहीं चलती। वर्षों बाद न्यायिक प्रक्रिया के तहत वे बरी हुए और जेल से बाहर आए। यह केवल कानूनी राहत नहीं थी, बल्कि राजनीतिक पुनर्जन्म की शुरुआत थी।

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वापसी की राजनीति: जेल से बाहर आने के बाद पप्पू यादव ने खुद को फिर से संगठित किया। उन्होंने अपनी पार्टी के माध्यम से एक वैकल्पिक राजनीति खड़ी करने की कोशिश की। हालांकि संगठनात्मक स्तर पर उन्हें सीमित सफलता मिली, लेकिन व्यक्तिगत लोकप्रियता बनी रही। यही दौर बताता है कि व्यक्ति-केंद्रित राजनीति की ताकत और सीमा दोनों क्या होती हैं।

2024: सबसे बड़ा कमबैक: लोकसभा चुनाव 2024 उनके करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। गठबंधन राजनीति में उन्हें टिकट नहीं मिला, लेकिन उन्होंने मैदान छोड़ा नहीं। निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उतरकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि जनाधार काग़ज़ी टिकट से बड़ा होता है। पूर्णिया की जनता ने भारी मतों से उन्हें फिर संसद पहुँचा दिया। यह जीत केवल चुनावी सफलता नहीं, बल्कि उस राजनीति की स्वीकृति थी जो व्यक्ति और जनता के सीधे रिश्ते पर टिकी है।

“गरीबों का मसीहा” की छवि: बाढ़, बीमारी, पुलिस-प्रशासन से जुड़े मामले—ऐसी अनगिनत कहानियाँ कोशी–सीमांचल में सुनाई देती हैं जहाँ पप्पू यादव मौके पर पहुँचे। आलोचक इसे ‘इवेंट पॉलिटिक्स’ कहते हैं, समर्थक इसे ‘मानवीय राजनीति’। सच शायद इन दोनों के बीच है, लेकिन इतना तय है कि वे दिखते हैं, सुनते हैं और प्रतिक्रिया देते हैं—और यही गुण उन्हें जननेता बनाता है।

विवाद और चुनौती: उनका नाम आज भी विवादों से पूरी तरह मुक्त नहीं है। विरोधी इसे उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बताते हैं। वहीं समर्थक मानते हैं कि बिहार जैसी जटिल राजनीति में बिना टकराव के लंबी यात्रा संभव नहीं। भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे संसद में अपनी लोकप्रियता को नीतिगत प्रभाव और क्षेत्रीय विकास में कैसे बदलते हैं।

निष्कर्ष: पप्पू यादव की राजनीति किसी पाठ्यपुस्तक का आदर्श अध्याय नहीं, बल्कि बिहार की जमीनी राजनीति का जीवंत दस्तावेज़ है—जहाँ संघर्ष भी है, विरोधाभास भी और वापसी की जिद भी। आज जन्मदिवस पर कोशी–सीमांचल यही देख रहा है कि क्या यह जननायक आने वाले वर्षों में केवल आवाज़ ही नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के लिए निर्णायक बदलाव का चेहरा भी बन पाएगा।

Disclaimer:-यह लेख विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों—जैसे कि राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, सार्वजनिक अभिलेखों, उपलब्ध आधिकारिक बयानों, इंटरनेट एवं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों, रिपोर्टों एवं चर्चाओं—के अध्ययन एवं विश्लेषण के आधार पर तैयार किया गया है।

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