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*जनसंवाद में जनाक्रोश: धमदाहा से सत्ता–सिस्टम को चेतावनी.*

धमदाहा में आयोजित ‘सरकार आपके द्वार’ कार्यक्रम केवल एक औपचारिक सरकारी आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह जनता के भीतर लंबे समय से सुलग रहे आक्रोश का सार्वजनिक मंच बन गया। रिश्वत के आरोपों पर मंत्री लेशी सिंह का कड़ा और सार्वजनिक रुख इस बात का संकेत है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो प्रशासनिक मनमानी पर लगाम लग सकती है.....??????

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जनसंवाद में जनाक्रोश: धमदाहा से सत्ता–सिस्टम को चेतावनी.

— जब ‘सरकार आपके द्वार’ जनता की आवाज़ बन गई

धमदाहा में आयोजित ‘सरकार आपके द्वार’ कार्यक्रम केवल एक औपचारिक सरकारी आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह जनता के भीतर लंबे समय से सुलग रहे आक्रोश का सार्वजनिक मंच बन गया। रिश्वत के आरोपों पर मंत्री लेशी सिंह का कड़ा और सार्वजनिक रुख इस बात का संकेत है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो प्रशासनिक मनमानी पर लगाम लग सकती है।

 

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भ्रष्टाचार की जड़ें और जनता का सब्र: राजस्व विभाग से जुड़ी शिकायतें नई नहीं हैं। दाखिल-खारिज, सीमांकन और प्रमाणपत्र जैसे बुनियादी काम वर्षों से आम आदमी के लिए “अघोषित शुल्क” का पर्याय बनते रहे हैं। जनता अक्सर डर, मजबूरी या निराशा में चुप रहती है। लेकिन धमदाहा में लोगों ने एक सुर में आरोप लगाकर यह साबित कर दिया कि सब्र की भी एक सीमा होती है।

 

मंत्री की फटकार: प्रतीकात्मक या निर्णायक?: मंत्री लेशी सिंह की सार्वजनिक फटकार और सस्पेंशन की चेतावनी निस्संदेह एक मजबूत राजनीतिक संदेश है। यह कदम अधिकारियों को यह याद दिलाता है कि सत्ता का असली स्रोत जनता है, न कि कुर्सी। हालांकि, सवाल यही है कि क्या यह सख्ती केवल मंच तक सीमित रहेगी या जांच और दंड तक पहुंचेगी? यदि कार्रवाई हुई, तो यह उदाहरण बनेगा; यदि नहीं, तो यह भीड़ के गुस्से को शांत करने भर का प्रयास माना जाएगा।

 

प्रशासन की परीक्षा: इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासन के सामने आईना रख दिया है। निष्पक्ष जांच, पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई—यही तीन कसौटियां तय करेंगी कि धमदाहा का यह जनसंवाद इतिहास बनेगा या सिर्फ एक खबर। यदि दोषी पाए जाने पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो ऐसे कार्यक्रमों की विश्वसनीयता पर सवाल उठना तय है।

 

जनता के लिए संदेश: इस घटना का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि लोगों को यह भरोसा मिला कि आवाज़ उठाने से असर पड़ सकता है। मंत्री द्वारा लिखित शिकायत देने की अपील प्रशासनिक प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में सही कदम है। जनता जितनी संगठित और तथ्यात्मक होगी, उतनी ही व्यवस्था जवाबदेह बनेगी।

 

धमदाहा का जनसंवाद सत्ता और सिस्टम—दोनों के लिए चेतावनी है। यह बताता है कि ‘जीरो टॉलरेंस’ का नारा तभी सार्थक होगा, जब चेतावनी के बाद कार्रवाई भी दिखे। अब गेंद प्रशासन के पाले में है। यदि वादे जमीन पर उतरे, तो यह कार्यक्रम एक मिसाल बनेगा; अन्यथा, यह भी भ्रष्टाचार की लंबी फेहरिस्त में एक और अध्याय जोड़ देगा।

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