बिहार में मकर संक्रांति आई नहीं कि नेता लोग थाली लेकर तैयार—दही-चूड़ा भी खाएंगे और राजनीति भी पकाएँगे।लेकिन इस बार तेजप्रताप यादव के घर की थाली में इतना मसाला पड़ा कि पूरे प्रदेश में चटपटा स्वाद फैल गया।
आठ महीने पहले तक तेजप्रताप का हाल ऐसा था-जैसे घर से निकला लौंडा भागलपुर बस स्टैंड पर बैठा हो—न घर जाने की जगह, न पार्टी की गाड़ी में सीट।कह दिया गया—“बाबू, अभी आप वनवास में जाइए… राजनीति ठंडी होने दीजिए।”
पर मकर संक्रांति क्या आई—वनवास खत्म, भोज शुरू और भोज भी ऐसा कि लग रहा था: “धर्मशाला नहीं,RJD की पारिवारिक पंचायत लगी है।”लालू प्रसाद पहुंच गए।बेटे को देखकर मुस्कुरा दिए। पत्रकारों ने पूछा—“नाराज़गी खत्म?” लालू बोले—“नाराज़गी कहाँ? आशीर्वाद रहेगा!”
यानी राजनीतिक भाषा में मतलब—“ठीक है, घर में घुस सकते हो…लेकिन पार्टी में अभी जूता बाहर ही उतारना पड़ेगा।”
अब आते हैं सबसे बड़े सवाल पर—तेजस्वी और राबड़ी कहाँ गए? लगता है दोनों ने कैलेंडर देखकर कहा होगा—“भोज तो बहुत हो चुके, इस बार हम पॉलिटिकल इंटरमिटेंट फास्टिंग कर रहे हैं।”
और अगर परिवार में सब प्यार ही प्यार है तो फिर सोशल मीडिया पर ‘कहाँ गायब’ वाला ट्रेंड क्यों चला? मतलब घर में प्रेम है, लेकिन फोटो में फ्रेम नहीं मिल रहा।
फिर तेजप्रताप भी क्या कम हैं! राज्यपाल, चेतन आनंद, साधु यादव—इतने मेहमान बुलाए कि ऐसा लगा जैसे भोज नहीं, नया गठबंधन कवायद चल रहा हो।
उधर भाजपावाले भी चुपचाप हलवा-खीर खा रहे होंगे,सोच रहे होंगे—“RJD के घर में खिचड़ी पकी है…देखते हैं कब हम इसमें ‘तड़का’ मार पाएँ।” और पत्रकार बेचारे—एक थाली दही-चूड़ा के लिए पूरे दिन पटना की राजनीति चबाते रहे।
व्यंग में भी सच्चाई:तेजप्रताप का वनवास तो खत्म हो गया, लेकिन RJD परिवार में जो ‘पॉलिटिकल कड़ाही’ चढ़ी हुई है, उसमें अब भी धीमी आँच पर बहुत कुछ पक रहा है। बिहार की राजनीति में दही-चूड़ा भोज सिर्फ भोज नहीं, पूरा सियासी मेन्यू है—और जनता बस इंतज़ार कर रही है कि अगला व्यंजन क्या परोसा जाएगा।😊