गिरफ्तारी या संदेश? पप्पू यादव केस से बिहार की राजनीति में भूचाल

लोकतंत्र में सवाल पूछने की कीमत क्या गिरफ्तारी बनती जा रही है?
(S.K. SAMRAT)

बिहार की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। पप्पू यादव की हालिया गिरफ्तारी ने राज्य में कानून, राजनीति और लोकतंत्र के रिश्ते को लेकर नई बहस छेड़ दी है। यह मामला केवल एक नेता की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर सवाल उठाता है जिसमें असहज करने वाली आवाज़ें अक्सर सबसे पहले निशाने पर आती हैं।

कानून का उद्देश्य समाज में न्याय स्थापित करना है, न कि राजनीतिक संदेश देना। लेकिन जब किसी राजनीतिक कार्रवाई का समय और संदर्भ जनहित से अधिक सत्ता-संतुलन से जुड़ा दिखे, तो स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा होता है। पप्पू यादव की गिरफ्तारी को लेकर भी यही सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह महज़ कानूनी प्रक्रिया है, या फिर राजनीतिक असहमति का जवाब।

पप्पू यादव एक ऐसे नेता रहे हैं जो सीधे और आक्रामक अंदाज़ में अपनी बात रखने के लिए जाने जाते हैं। उनकी राजनीति से सहमत होना या असहमत होना व्यक्तिगत दृष्टिकोण हो सकता है, लेकिन यह नकारा नहीं जा सकता कि वे लंबे समय से जनता के कुछ वर्गों की आवाज़ बने हुए हैं। ऐसे में उनकी गिरफ्तारी को आम लोग केवल एक कानूनी घटना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संकेत के रूप में भी देख रहे हैं।

लोकतंत्र की बुनियाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर टिकी होती है। सरकार की आलोचना करना, नीतियों पर सवाल उठाना और सार्वजनिक मुद्दों को उठाना किसी भी जनप्रतिनिधि का अधिकार ही नहीं, बल्कि कर्तव्य भी है। यदि इन गतिविधियों को कानून व्यवस्था के नाम पर सीमित किया जाने लगे, तो लोकतांत्रिक संतुलन कमजोर पड़ता है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि कानून सबके लिए समान हो। यदि किसी व्यक्ति पर आरोप हैं, तो जांच होनी चाहिए और न्यायिक प्रक्रिया अपने रास्ते चले। लेकिन यही प्रक्रिया बिना भेदभाव के हर उस व्यक्ति पर भी लागू होनी चाहिए जो सत्ता या प्रभाव के करीब है। चयनात्मक कार्रवाई कानून की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

बिहार पहले से ही बेरोजगारी, पलायन, अपराध और प्रशासनिक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में राजनीतिक टकराव और गिरफ्तारियों की राजनीति जनता की समस्याओं को और पीछे धकेल देती है। आम नागरिक यह जानना चाहता है कि शासन उसकी जिंदगी बेहतर बनाने के लिए क्या कर रहा है, न कि यह कि किस नेता को कब और क्यों रोका गया।

पप्पू यादव की गिरफ्तारी एक चेतावनी की तरह भी देखी जा सकती है—कि क्या बिहार की राजनीति सवालों से डरने लगी है। यदि ऐसा है, तो यह चिंता का विषय है। लोकतंत्र में सरकारें मजबूत तब होती हैं जब वे आलोचना सहने का साहस रखती हैं, न कि तब जब वे उसे दबाने का प्रयास करती हैं।

अंततः, इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ी जिम्मेदारी सत्ता की है। उसे यह स्पष्ट करना होगा कि कानून का इस्तेमाल किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए नहीं, बल्कि न्याय के लिए हो रहा है। साथ ही, नागरिक समाज और मीडिया की भी भूमिका अहम है—सवाल पूछते रहने की, क्योंकि लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब सवाल ज़िंदा रहते हैं।

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